एक दुनिया है जहाँ, घनघोर अंधेरा है।
जगह-जगह लगा, हवस का पहरा है।
रात के साय में, यहाँ जीती है ज़िंदगी,
उजाला तो अब भी, शहरों में ठहरा है।
एक दुनिया है जहाँ, घनघोर अंधेरा है।
जगह-जगह लगा, हवस का पहरा है।
यहाँ भूख के आगे, सम्मान बिकता है।
रईस बोली में, आखिर तक टिकता है।
नोंचता है बोटी-बोटी, जैसे गिद्ध हो,
क्या इसाँ को इसाँ, ऐसे नोंच सकता है।
लौट जाती हैं चीखें, दरवाजा खोल के।
चुप हो जा होंठों से, चुपचाप बोल के।
जिस्म का छलनी होना, मर्क़ज में है,
रूह तार-तार होती है, बिना मोल के।
दरिया बह जाता है, कल्ब से चश्म तक,
लेकिन आगे तो लगा, पलकों का सहरा है।
दर्द को बना लिया, बिस्तर का हमसफ़र,
इसलिए बेबसी में भी, मुस्कुराता चेहरा है।
एक दुनिया है जहाँ, घनघोर अंधेरा है।
जगह-जगह लगा, हवस का पहरा है।
यहाँ सुबह हुई काली, फिर काली रात हुई।
बदनाम तो बस एक यहाँ औरत जात हुई।
कई गालियों से नवाजा है, लोगों ने उन्हें,
'रंडी' सुनना तो उनके लिए, आम बात हुई।
शिकारी ने आकर, सबकुछ तबाह किया।
नासूर बने हैं जख़्म, न दर्द से आह किया।
जब तोड़ दिया दम, हर एक सांस ने,
जिस्म की चिता में, फिर रूह को स्वाह किया।
घुट-घुटकर जीना भी, सीख लिया है अब,
जिस्म से ज्यादा, घाव रूह पे गहरा है।
एक दुनिया है जहाँ, घनघोर अंधेरा है।
जगह-जगह लगा, हवस का पहरा है।
आज भी हक़ दिलाने, आता नहीं कोई।
वादा करके, फिर निभाने आता नहीं कोई।
कैसे आए रौशनी, सब चिराग बुझा गए,
यहाँ चिराग जलाने, अब आता नहीं कोई।
फिर भी अबतलक, खामोश है जुबां,
पता है, इसाँ यहाँ, अंधा और बहरा है।
एक दुनिया है जहाँ, घनघोर अंधेरा है।
जगह-जगह लगा, हवस का पहरा है।
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