स्त्री को स्त्री ही रहने दो
देवी मत कहो,
उसके माथे पर चमत्कार का बोझ मत रखो।
वह इंसान है
थकती है, टूटती है, फिर भी चलती है
अपने कंधों पर अपना आसमान ढोती है।
उसके संघर्ष मंदिरों में नहीं,
रसोई, सड़क, दफ़्तर और रिश्तों में पलते हैं।
जहाँ हर दिन उसे
खुद को साबित करना पड़ता है
बिना शंखनाद, बिना जयकार के।
उसका प्रेम मौन होता है,
पर गहरा
जो शिकायत नहीं करता,
बस निभाता है।
वह प्रेम जो लौटकर आने की शर्त नहीं रखता।
और दया
उसकी कमजोरी नहीं,
उसकी चेतना है।
दया जो उसे कठोर नहीं बनने देती
इस कठोर दुनिया में भी।
उसे देवी कहकर
उसकी पीड़ा का उपहास न करो,
उसके आँसू भी साधारण हैं,
और उतने ही सच्चे।
स्त्री को सम्मान दो
मूर्ति बनाकर नहीं,
मनुष्य मानकर
उसे स्त्री ही रहने दो,
देवी मत कहो
यही उसकी शक्ति है
यही उसकी पहचान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X