मन में है हलचल,
ठहरा हुआ है जल,
बढ़ने लगा रिसाव,
आशंका प्रति पल,
प्रकृति के अनुरूप,
नदी बहे कल-कल,
मर्यादित व्यवहार,
ख़तरा जाये टल,
अमर्यादित कृत्य,
हो जैसे दल-दल,
छोड़ो अंधी दौड़,
मीठा इसका फल,
जागरूक सरकार,
है भविष्य उज्जवल,
'गुंजन' मन को फेर,
तब निकलेगा हल,
-शशि भूषण मिश्र 'गुंजन'*
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