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अब रोता हूँ तो आँखों से ये लहू की धारा बहती है

                
                                                         
                            स्याह वीरान रात और अंतर्मन में अंधियारा है
                                                                 
                            
पूरा आसमान सुनसान,ना कोई चाँद ना ही कोई सितारा है
इधर-उधर,तितर-बितर मैं,उजड़ा हुआ घरौंदा भी मैं
नौकरी छोड़ कर निकला हूँ,मन में मेरे अनगिनत सवाल है
हाथ उठे है लिखने को,और कलम बनी मसाल है ।।

तिनका तिनका जोड़ कर ये महल बनाने की कोशिश है
मैं समझता हूँ मुझे रास्ते पे लाना उस ऊपर वाले की साज़िश है
बिता दी मैंने पिछली रात ठंड में ठिठुरते लखनऊ की सड़कों पे
आओ देखो छू लो नफ़्ज़ कि ख़ून में मेरे अब भी उबाल है ।।
हाथ उठे है लिखने को,और कलम बनी मसाल है ।।

अब रोता हूँ तो आँखों से ये लहू की धारा बहती है
ये सारी दुनिया घर वालों से मेरे बारे ना जाने क्या क्या कहती है
कि धिक्कार है,मक्कार है,नकारा है,आवारा है,दो कौड़ी का आदमी ये तो कंगाल है
हर किसी का मेरे बारे में एक यहाँ बुरा ही ख्याल है
पर हाथ उठे है लिखने को,और कलम बनी मसाल है ।।

तो मौत की गोद में जाने से पहले कुछ बन जाते है
चिता को अग्नि लगवाने से पहले कुछ बन जाते है
और ना जाने कब कौन चला जाए इस दुनिया से
कुछ कर गुज़रने के मेरे पास बचे हुए कुछ ही साल है
हाथ उठे है लिखने को,और कलम बनी मसाल है ।।
- शशांक श्रीवास्तव
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4 दिन पहले

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