तेरी इक झलक की ख़ातिर, नज़रें बिछाई थीं हमने,
तू सामने आएगी कभी, इसी उम्मीद में साँसें सजाई थीं हमने।
हो जाते ख़ैरियत हम भी, चारासाज़ों के घराने से हैं,
तेरी गोद में सिर रखने को ही तो तबीयत बिगाड़ी थी हमने।
तेरे बाद भी महफ़िलों में मुस्कुराते रहे हम,
मगर तन्हाई में हर दफ़ा आँखें भिगोई थीं हमने।
तेरे नसीब में जो आया है, वो तेरा होकर रहे उम्र भर,
उसकी ख़ुशी में ही तो अपनी ख़ुशी तलाश ली थी हमने।
तुझे किसी और की बाहों में मुकम्मल देखकर भी सुकूँ आया,
अपने हिस्से की मोहब्बत तेरे नाम से हारी थी हमने।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X