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उसे बस एक और अच्छी औरत चाहिए

                
                                                         
                            हमारे मोहल्ले में
                                                                 
                            
एक औरत रहती थी—
बहुत अच्छी थी।

इतनी अच्छी
कि उसके हिस्से की धूप
भी लोग अपने आँगन में सुखा लेते थे।

वह कभी पलटकर नहीं बोलती थी।
लोग कहते थे—संस्कारी है।

वह अपना दुख छिपा लेती थी।
लोग कहते थे—समझदार है।

वह अपमान के बाद भी चाय पूछती थी।
लोग कहते थे—घर जोड़ना जानती है।

एक दिन वह चली गई।

नहीं,
मरी नहीं थी—
बस उसने सबकी सुविधा के अनुसार
जीना बंद कर दिया था।

मोहल्ले में शोकसभा हुई।

उसके चरित्र पर फूल चढ़े,
उसके त्याग पर भाषण हुए,
उसकी सहनशीलता के क़िस्से सुनाए गए।

किसी ने नहीं पूछा—
जिस औरत को सब इतना अच्छा कहते थे,
वह अपने जीवन में
इतनी अकेली क्यों थी?

उसकी एक पुरानी सहेली ने कहा,
“वह बहुत दुखी थी।”

लोगों ने उसे चुप करा दिया।

“मरे हुए लोगों की बुराई नहीं करते।”

मैंने सोचा—
ज़िंदा रहते हुए
उसके दुख की बात करना भी तो
यहाँ बुराई ही था।

फिर मैंने देखा,
उसकी बेटी को समझाया जा रहा था—

“अपनी माँ जैसी बनना।”

बेटी ने पूछा,
“उनकी तरह अच्छी
या उनकी तरह दुखी?”

कमरे में पहली बार
सच ने अपनी चप्पलें उतारीं
और आराम से बैठ गया।

किसी के पास जवाब नहीं था।

मैंने उस दिन जाना,
अच्छाई हमेशा सफ़ेद नहीं होती;
कभी-कभी वह
दूसरों के अपराध छिपाने वाला
सबसे साफ़ कपड़ा होती है।

और त्याग?

त्याग वह सिक्का है
जिसे औरत अपनी उम्र देकर खरीदती है,
और समाज उसी सिक्के से
उसकी आज़ादी की क़ीमत चुकाता है।

मुझे अच्छी औरतों से डर लगता है—
उनसे नहीं जो प्रेम करती हैं,
बल्कि उनसे
जो अपने घावों को तमगा बनाकर
अगली पीढ़ी के गले में पहना देती हैं।

जो कहती हैं—
“हमने भी तो सहा था।”

जैसे दुख कोई पुश्तैनी ज़मीन हो,
जिसका बँटवारा बेटियों में होना ज़रूरी है।

जैसे माँ की अधूरी ज़िंदगी
बेटी के नाम की वसीयत हो।

नहीं।

मैं अपनी माँ से प्रेम कर सकती हूँ,
बिना उसकी हर मजबूरी को
अपना भविष्य बनाए।

मैं अपनी परंपरा का सम्मान कर सकती हूँ,
बिना हर पुरानी ग़लती को
पवित्र घोषित किए।

मैं अच्छी हो सकती हूँ,
बिना किसी के सामने
अपनी आत्मा की तलाशी दिए।

क्योंकि जिस दिन औरत का दुख
उसकी महानता का प्रमाण बन जाता है,
उस दिन समाज को
उसका दुख दूर करने की
कोई ज़रूरत नहीं रह जाती।

उसे बस एक और अच्छी औरत चाहिए—

जो अगली शोकसभा में
अपनी माँ के लिए रोए,
और घर लौटकर
अपनी बेटी को समझाए—

“बेटी, दुनिया ऐसी ही है।”

और दुनिया,
हर बार की तरह,
एक और औरत की लाश पर
अपनी उम्र बढ़ा ले।
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15 घंटे पहले

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