रक्तिम संध्या, स्वर्णिम नभ, ध्वज-शिखा लहराए,
माटी का कण-कण मातृ-मंत्र, मंगल-दीप जलाए।
गंग-तरंगों में ऋचाएँ झरें, हिमगिरि वेद सुनाए,
सनातन-सूर्य अनादि-अमर, तम-पट दूर भगाए।
वेद-वाणी, उपनिषद्-ज्योति, गीता का जयगान,
राम-मर्यादा, बुद्ध-करुणा, शिव-संकल्प महान।
यज्ञ-ज्योति-सी युग-युग दीप्त, अक्षय संस्कृति-धारा,
भारत! तेरे रोम-रोम में, स्पंदित सत्य-सितारा।
रक्त-रंजित रणभूमि में जो, हँसकर शीश चढ़ाए,
हुतात्माओं के तप्त रक्त से, स्वाधीन प्रभात उगाए।
अस्थि-रज से पावन धरती, रक्त-रंजित इतिहास—
अमर बलिदानों से दीप्त रहे, भारत का विश्वास।
नहीं स्वतंत्रता केवल उत्सव—अग्नि-जागरण है,
राष्ट्र-ऋणों के निर्वहण का, पावन आह्वान है।
एकत्व-मंत्र मुखरित हो, मिटे विभेद का तम,
वसुधैव कुटुम्बकम् गूँजे, जन-जन में शुभ-संगम।
माँ! तेरी अक्षय संस्कृति-ज्योति, युग-युग प्रज्वलित हो,
तेरी संतति सत्य-धर्म-पथ पर, निर्भय संकल्पित हो।
हुतात्माओं के रक्त-ऋण का, मान अमर रह जाए—
मातृभूमि! तेरे चरणों में, जीवन-दीप जलाए।
- श्री सनातन मुकुंद
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