बादल भैया नभ में आए, रुई-से कोमल गात।
टिप-टिप बूँदें बरसाकर, लाए सुख-सौगात॥
मलयानिल संग इठलाते, छेड़ें मधुर मल्हार।
तृषित धरा पुलक उठी, पाकर जल-उपहार॥
मोर पखेरू पंख पसारे, थिरके बारंबार।
कोयल पंचम स्वर में गाए, महके गुलज़ार॥
कल-कल बहती सरिता,
झर-झर झरे नीर॥
फूल बिखेरें मधु-सुगंध, हँसता हर वन-तीर॥
दामिनि दमके क्षणभर नभ में, गूँजे मेघ-मृदंग।
इन्द्रधनुष की रंग-पिटारी, बिखराए नव उमंग॥
तितली रंग समेटे उड़ती, भँवरा गाए गान।
कागज़ की नौका ले दौड़ें, हँसते नन्हे प्राण॥
आम्र-विटप की डाली झूले, बोले पिक मनमीत।
सावन बनकर गाए प्रकृति, जीवन का संगीत॥
आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ, रखें धरा की शान।
बादल हर सावन बरसाएँ, जीवन का वरदान॥
- श्री सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X