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अनकहे एहसास : प्रतीकात्मक दार्शनिक गीत

                
                                                         
                            शब्द-द्वार जब बंद हुए, मौन स्वयं खुल आया,
                                                                 
                            
अंतर-वीणा के तारों ने, अनहद-राग सुनाया॥

नयनों की नीरव ऋचाओं में, स्वप्न-सुमन मुस्काए,
अधरों के निर्जन आँगन में, अर्थ स्वयं उतर आए॥

दीप न बोला, फिर भी उसने, तम का मर्म पढ़ाया,
चंदन-वन-सी मंद पवन ने, चिर-संदेश सुनाया॥

नदियाँ सागर से मिलकर भी, कुछ भी कह न सकीं थीं,
लहरों ने बस स्पर्श लिखे, गहराइयाँ हँस दी थीं॥

ओस-बिंदु में भोर छिपी थी, नभ पलकों पर ठहरा,
एक किरण के मौन प्रणय ने, प्राण-क्षितिज सँवारा॥

बीजों ने धरती की गोदी में, निःशब्द वन उगवाए,
मौन-मेघ ने सूखे मन पर, अमृत-कण बरसाए॥

जो अभिव्यक्त हुआ अधरों से, वह तो क्षण का मेला,
जो अव्यक्त रहा अंतस में, वही अनंत अलबेला॥

क्षितिज मिला जब सिन्धु से, रेखा कहीं न पाई,
अनकहे एहसासों ने तब, मौन-मुक्ति अपनाई॥

- श्री सनातन मुकुंद
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3 घंटे पहले

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