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ग़म, हमें सहना नहीं आता

                
                                                         
                            यारो अपनों के बिन, हमें रहना नहीं आता
                                                                 
                            
दुनिया के दिए ग़म, हमें सहना नहीं आता
बड़ी उलझन में है हमारी ये ज़िन्दगी यारो,
किसी से दर्दे दिल, हमें कहना नहीं आता
ज़िन्दगी की डगर में हैं बस कांटे ही कांटे,
पर उनसे भी बच के, हमें चलना नहीं आता
खुशनसीब हैं जो रह लेते हैं अपने में मस्त,
पर अकेले से गुमसुम, हमें रहना नहीं आता
देखते रहते हैं हम दरिया के धारे रात दिन,
अफसोस,साथ उनके, हमें बहना नहीं आता
अच्छा ही होता कि बदल जाते हम भी "मिश्र",
पर लोगों की घातों को, हमें सहना नहीं आता
-शांती स्वरूप मिश्र
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10 घंटे पहले

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