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ये जो ईद आई

                
                                                         
                            ये जो ईद आई ख़ुशी ही ख़ुशी है
                                                                 
                            
मगर इक ख़लिश है तुम्हारी कमी है

बग़ैर उसके जीना है आधा अधूरा
मुकम्मल वही तो मेरी ज़िन्दगी है

बुझे जा रहे हैं चराग़ ए मुहब्बत
इधर बीच कैसी हवा चल रही है

मिली उसमें बच्ची किताबें बचाती
तरक़्क़ी की ख़ातिर जो बस्ती जली है

न काल उनकी आई न मैसेज़ ही आया
अभी जैसे बाक़ी कोई बरहमी है

नहीं ख़ुश्क हो पाई उल्फ़त की धरती
हमारी इन आंखों में अब भी नमी है

बुरी "शम्स "मुझको न जाने लगी क्यों
वही बात जो सबको अच्छी लगी है
-शम्स कुंडवी
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एक वर्ष पहले

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