मैं जो हूँ, सो हूँ
इतना करने के बाद भी
घर आकर कभी स्वागत नहीं होता।
मेहनत की थाली पर
प्रशंसा का एक कौर भी नहीं मिलता।
उलटे सुनने को मिलता है—
“तुम्हें तो लोग व्यर्थ ही
इधर से उधर लगाकर
अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं।”
कभी कोई लैपटॉप पकड़ा देता है,
कभी कविता की कॉपी थमा देता है।
कभी कई उलझनें कंधों पर रखकर
निश्चिंत हो, कोई आगे बढ़ जाता है।।
और मैं—
अपनी ही जगह खड़ा रह जाता हूँ,
जैसे किसी सीढ़ी का वह पायदान,
जिस पर चढ़ लोग ऊपर पहुँचते हैं,
पर पीछे मुड़कर मुझे नहीं देखते हैं,
और न ही एक चुटकी सम्मान देते हैं।
घर में बातों के कड़वे घूँट पीता हूँ—
“यही दिमाग कहीं और लगाते,
अपनी विद्वमता बेचकर
दो पैसे तो कमा लाते।।”
मुस्कुराकर कहता हूँ—
मैं नहीं सुधरूँगा।
मैं जो हूँ, सो हूँ।।
चाहे लोग मेरा दुरुपयोग करें,
मुझे अपनी सीढ़ी बनाएँ,
मेरे सहारे ऊँचाइयाँ छू लें,
और मुझे कहीं किसी कोने में
अकेला खड़ा छोड़ जाएँ—
पर मैं जो हूँ, सो हूँ।।
मेरी उपयोगिता
सब जानते हैं,
पर मेरी अंतर्मन को
कम ही पहचानते हैं।
न ज्ञान को बाज़ार की वस्तु बनाता,
न अपनी विद्वता बेचना ही चाहता।
अर्थ नहीं मिला,
तो क्या हुआ?
कभी-कभी उपलब्धि की
क्षणभर मिली रोशनी भी
अँधेरे मन में आत्मसंतोष का
एक दीप अवश्य जला देती है।
इसी दीप को थामे मैं
अपनी राह चलता जाता,
घर में बातें सुनता हूँ,
कभी-कभी बाहर भी
थाली से तेज़ पत्ते की तरह
निकाल दिया जाता हूँ।
फिर भी न टूटता हूँ,
न बदलता हूँ, और
न अपने होने के अस्तित्व से
इनकार करता हूँ।
मैं जो हूँ, सो हूँ।
लोग आएँगे, जाएँगे,
अपना काम निकालेंगे,
फिर मुझे भूल जाएँगे—
पर मैं अपने भीतर
एक संसार बचा रखूँगा।
जहाँ ज्ञान बिकता नहीं,
जहाँ कविता झुकती नहीं,
जहाँ मन हारता नहीं—
वहीं मेरा घर है,
वहीं मेरी पहचान है।
इसलिए आज भी
मुझे बदलना मत,
स्वार्थ के तराज़ू पर
मुझे तौलना मत,
क्योंकि मैं जो हूँ, सो हूँ।
मैं उपयोगी हूँ,
उपयोग की वस्तु नहीं।
विद्वान हूँ,
पर बिकाऊ नहीं।
मैं अकेला हूँ,
पर अधूरा नहीं।
मैं जो हूँ, सो हूँ—
और यही होना
मेरी सबसे बड़ी जीत है।
-शम्भु प्रसाद
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