माँ की कोख से निकले
संग संग खेले संग संग बड़े हुए
लड़ते रहे झगड़ते रहे भाई बहन के रूप में
हम साथ साथ पलते रहे
जब बड़े हुए तो दीदी दोस्त बनी
पर भईया कुछ सख्त नज़र आने लगा
नहीं स्वीकार थी खुद की बराबरी हमसे
वो खुद को अभिभावक समझने लगा
समय बदला और बड़े हुए तो जाना
जब संग संग खेले और बड़े हुए थे
समय के साथ फिर हमारे संग क्यों ये भेद खड़े थे
वह दोस्त बन सकता था मेरा या बड़ा भाई
पर अभिभावक तो सिर्फ माता पिता हैं मेरे
मैं लड़की हु इसलिए शायद यह विचार आया होगा
उसके मस्तिष्क में समाज ने यह बिठाया होगा
है पुरुष अगर वह तो लैंगिक श्रेष्ठता का अधिकारी है
उसकी बात सदियों से ही हम महिलाओं पे भारी है
यह आम रिवाज़ है लड़ियों के लिए
भाई छोटा हो या बड़ा उसका संरक्षक बन जाना
हुकुम चलाना बहनों पर और उनका भाग्य सुनिश्चित करना
क्या अधीनता स्वीकार करने से ही सुरक्षा सुनिश्चित होती है
फिर क्यों इतने अभिभावक के बाद भी किस्मत हमारी बद से बत्तर है
हम सदियों से इस दुनियावी जाल में फसते आये हैं
जीवन के हर मोड़ पर नए अभिभावक गड़ते आये है
खुद उठो और संघर्ष करो
हमे साथी की दोस्त की ज़रूरत है
जो बराबरी से सुने हमें और समझ सके
राय दे अपनी पर थोपे नही
हमें अब और अभिभावकों की ज़रूरत नही
जिस रिश्ते में मिलो वैसे ही मिलो
है स्वतंत्रत अगर यह दुनिया तो
कुछ हमे भी जीने दो......अगली बार जब भी मिलो सिर्फ
भाई या दोस्त बनकर मिलो.....
'शाईस्ता शकील हैदर'
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