**शून्य से संभावना**
ओह!स्त्री और उसकी प्रकृति..!
एक दीर्घ नि:शवास....!
हृदय से पुरुष की पीड़ा देखी नही गयी....!
उसने उसके बोध की डोर....!
आत्मा को पकड़ा दी....!
और आत्मा थोड़ी देर शांत रहा....!
फ़िर,पुरुष से कहा---!
सुनो,जाओ!प्रकृति के नजदीक....!
जा कर बैठो स्थिर करो मन को....!
फ़िर,अपने बोध की सीढ़ियों से....!
धीरे-धीरे सम्भलकर उतरो....!
अपने भीतर एकांत कक्ष में....!
तुम्हें एक शोर सुनाई देगी....!
उसे साधना तुम हल्के हो जाओगे....!
और स्वयं से ऊपर भी आ जाओगे....!
फ़िर,गौर से देखना आकाश को....!
वह खाली बिल्कुल शून्य नज़र आएगा....!
फ़िर,देखना पहाड़ को....!
वह पाषाण ह्रदय लिए....!
अडिग खड़ा प्रतीक्षारत दिखेगा....!
फ़िर,देखना तुम रेगिस्तान को....!
वह कोसों दूर-दूर तक....!
वीरान आशा-विहीन दिखेगा....!
तुम सघन घने जंगल में भटकना....!
वह भयभीत दिखेगा....!
नदियों के संग बहना....!
वह मोह-विहीन दिखेगी....!
झरनों के संग घाटी में उतरना....!
वह बिल्कुल अधीर दिखेगी....!
तितलियों के संग उड़ान भरना....!
वह आसक्त दिखेगी....!
पक्षियों के संग चहचहाना....!
वह आश्चर्यजनक ढंग से आश्वसत दिखेगी....!
और..!जब घबराने लगे मन....!
सूरज..!खोने लगे अपना पराक्रम....!
साँझ..!फैलाने लगे अपने साम्राज्य का विशाल दामन....!
खग..!समेटने लगे अपने कोलाहल करते चूजों को....!
पँखपखेरू के भीतर घोसलों में....!
तुम भी लौट आना अपने घर....!
फ़िर,देखोगे तुम उस स्त्री को....!
जो,सुरमयी आभा लिए आँचल की ओट में....!
अपने भीतर की लौ को....!
माँझ आँगन तुलसी को अर्पित करते हुए....!
तुम एक साथ अपने आत्मबोध से अर्जित....!
उन सभी एहसासों को उस स्त्री में पाओगे....!
जो,तुमने दर-दर भटक कर शिद्दतों से पाया है....!
तुम्हें एहसास होगा....!
वह, तुम्हारे भीतर स्थितप्रज्ञ आनंद सी बसी है....!
जिसे पाने और समझने के लिए....!
तुम्हें आकाश की तरह....!
विशाल और शून्य होना पड़ेगा....!
क्योंकि..!स्त्री साधक है शून्य से संभावना की....!!!!"-
- शैलजा झा,
बोकारो स्टील सिटी, झारखण्ड।
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