तुम आदिशक्ति की पुत्री हो
तुममें दुर्गा का तेजोबल
रतिकन्या! तुममें बसता है
इस सृष्टि का सौंदर्य सकल.
जब वेद-ऋचाएँ देती हों
गार्गी, अपाला का परिचय
फिर जग को उनकी पीढ़ी की
बुधिमत्ता पर कैसा संशय .
तुम उस सावित्री की संतति
जिसके सम्मुख यम हुए मौन
सीता के त्याग, सती के हठ
मीरा-धुन से अनभिज्ञ कौन .
जब बात प्रशासन की आयी
तुम तब रज़िया सुल्तान बनीं
जब जौहर व्रत का प्रश्न उठा
माँ पद्मावती ने मसान चुनी .
तुमने लक्ष्मीबाई बनकर
दिखलाया था जो रण-कौशल
पर्याप्त है यह बतलाने को
तुम अबला नहीं, सबल-सम्बल.
टेरेसा अपने आँचल में
ममता,करुणा सब भर लायीं
कल्पना ने पंख पसार दिए
और अंतरिक्ष को छू आयीं.
सानिया, सायना और सिंधु
स्मृति, दीपा की यशोकीर्ति
हर एक युवा को कर प्रेरित
देती नव-ऊर्जा, नव-स्फूर्ति.
कोई दौर नहीं, कोई ठौर नहीं
जब तुम पुरुषों से पीछे थीं
सहगमन सदैव किया तुमने
हाँ नज़रें शायद नीचे थीं.
वह बेलन से बन्दूक तलक
न बंधी किसी एक हद में है
जो कुछ भी उसकी ज़िद में है
वह सब नारी की ज़द में है.
- शैलेन्द्र कुमार रस्तोगी
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