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अब कोई पानी रखने वाला न था।

                
                                                         
                            बेटा विलायत जाता है,
                                                                 
                            
माइक्रोसॉफ्ट, पेप्सिको में
सीईओ बन जाता है,
उसकी एक उँगली के इशारे पर
दुनिया का कारोबार चलता है—
बस, नहीं चलता
उसके अपने घर का चूल्हा।

उधर माँ की आँखों में
दरवाजे की साँकल अटकी है,
बाप की लाठी के सहारे
एक उम्र चौखट पर लटकी है।

फोन की नीली रोशनी में
माँ का चेहरा चमकता है,
बेटा कहता है—फिर बात करेंगे,
और अँधेरे में एक कमरा
देर तक सिसकता है।

धीरे-धीरे रिश्ते टूटते हैं
डाली से सूखे पत्तों की तरह,
हवा उन्हें कहाँ ले जाती है,
कोई नहीं पूछता।

माँ की थाली में
रोटी पत्थर होने लगती है,
पानी का गिलास
खाली आँखों से ताकता है,
और बिस्तर पर पड़ी देह में
हड्डियाँ उभरने लगती हैं।

बाप शहर-दर-शहर भटकता है,
हथेली में फैली लकीरों के साथ,
कभी किसी दरवाजे पर पानी माँगता,
कभी किसी फुटपाथ पर
रात से छिपाता अपनी साँस।

उधर बेटे के महल में
काँच की दीवारें हैं,
इधर पुश्तैनी घर में
सीलन खाती तस्वीरें।

एक दिन बंद दरवाजे के पीछे
माँ की साँस थम जाती है,
खिड़की पर बैठी गौरैया
कई बार चहककर उड़ जाती है।

कई महीने बाद ताला टूटता है—
कमरे में धूल है, बदबू है,
फर्श पर बिखरी हड्डियाँ हैं,
तकिए के नीचे बेटे का बचपन,
दीवार पर कुछ धुँधली तस्वीरें हैं।

बंद खिड़की के पीछे
वक्त सड़ता रहा महीनों,
माँ की सूनी आँखों में
दफन हो गए सारे सपने।

अलमारी में नोटों की गड्डियाँ,
दरवाजे पर जंग लगा ताला,
दुनिया चलाने वाला बेटा
घर को ही नहीं सँभाल पाया।

बेटा वीडियो कॉल पर
अंतिम दर्शन कर लेता है,
पैसे भेजकर समझता है
कि अपना फर्ज पूरा कर देता है।

मगर कोई बताए उसे—
क्या रुपये कंधा बन सकते हैं?
क्या स्क्रीन के उस पार से
माँ के ठंडे माथे को छू सकते हैं?

बेटा विलायत में है,
दुनिया उसके इशारे पर चलती है;
माँ मिट्टी में सो गई,
बाप किसी सड़क पर पानी खोजता है।

वह विलायत में सीईओ बना रहा,
यहाँ घर में मौत का सन्नाटा था;
जिस माँ ने उसे जन्म दिया,
उसकी देह के पास
अब कोई पानी रखने वाला न था।

वह दुनिया का सीईओ है,
पर अपने घर का वारिस नहीं—
उसने सारी दुनिया जीत ली,
बस माँ-बाप के बचे हुए दिन
हार आया।
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2 घंटे पहले

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