मासूमियत निगाह-ए-नाज़ की कमाल थी,
निगाह-ए-शौक़ हमारी भी बा-कमाल थी।
इत्तेफ़ाक़न वो नज़र से नज़र का टकराना,
ज़मीं पर रूहानी मोहब्बत भी कमाल थी।
कभी ख़्वाबों में कभी ख़यालों में मिलना,
इब्तिदा-ए-इश्क़ की सूरत भी कमाल थी।
चाँद रात चाँदनी में तन-बदन भिगोते हुए,
तसव्वुर में बातें-मुलाक़ातें भी कमाल थी।
सिवा इसके और कुछ कहते नहीं बनता,
कि दिल-फ़रेब सादगी उसकी कमाल थी।
- शैलेन्द्र भटनागर "शील"
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