लेकिन मैं पूछती हूं इस सत्ता के शोर से—
जब आप बाहर वालों से लड़ने का हुनर सीख कर लौटेंगे,
तब इस घर के अंदर की दीवारों का क्या होगा?
क्या घर के अंदर के लोगों को मज़बूत रखने के लिए,
उन्हें डराना ज़रूरी है? या उनका हाथ थामना?
असली मजबूती बंदूकों से नहीं आती,
असली मजबूती तो तब आती है—
जब घर की बेटियां आधी रात को बिना किसी खौफ के सड़क पर चल सकें,
जब नौजवानों को अपनी किताबों और पर्चों से प्यार करने की आज़ादी हो,
जब किसी नुक्कड़ नाटक के कलाकार पर स्याही फेंकने का डर न हो.
घर तब मज़बूत होता है, जब अंदर की नफ़रत हारी जाती है,
जब 'हम और वो' की लकीरें अपनों के बीच नहीं खींची जातीं.
-शफ़क़ रऊफ
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