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सुनता है जमाना दिल से

                
                                                         
                            उनकी बद्दुआओं से मैं बनता हूं
                                                                 
                            
उनकी आलोचनाओं से मैं बनता हूं
सुनता है जमाना,दिल से जो मैं कहता हूं
जो देते गाली मुझे,उनके दिलों में मैं रहता हूं
मेरे दिल में स्वदेश प्यार पलता है
मेरे दिल से धुआं जो निकलता है
उस पर जमाना चलता है
दिल बहुत कुछ कहता है
मेरे अंदर धीरे धीरे कुछ कुछ सुलगता है
जिसमें जमाना झुलसता है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

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