वक्त और किस्मत न जाने
इंसान को क्या रंग दिखलाएं।
देखे न कभी जिनके चेहरे
उनके भी तलवे चटवाएं ।।
पौंछे थे कल आंसू जिनके
वे आज मेरे अश्कों पर मुस्काएं ।।
जिनको दी कल रोटी मैने
वह होटल की मुझे राह बताएं ।।
वक्त और किस्मत न जाने
इंसान को क्या रंग दिखलाएं ।
कंचन काया, बेहद सरमाया
सब कल के किस्से बन जाएं ।।
ऊंगली पकडकर चलने वाले भी
पास न होते जब पग डगमगाएं ।।
- सत्यपाल सिंह
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