उनकी गली के जब हम सुबह शाम फेरे लगाते थे
वो भी हमें देखे बगैर चैन कहाँ पाते थे ।
हमें देखते ही उनका चेहरा खिल उठता था
हसीन चेहरे पर कई चाँद नजर आते थे ।
बहुत सुकून मिलता था उनके दीदार से हमें
दिल के वीराने में, फूल खिल जाते थे ।
हमारी सुबह होती थी उनके ही नाम से
उनका नाम लेकर ही हम सो जाते थे ।
वादियों में मिलते थे जब किसी शाम हम
बाहों में आकर वो हाले-दिल सुनाते थे ।
होता था जब कभी जिक्र तन्हा रातों का
बेजुबां से होकर वो सीने से लग जाते थे ।
-सत्यपाल सिंह
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