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संयोग बनते हैं स्वर्ग में

                
                                                         
                            उसे भी तलाश थी
                                                                 
                            
शहर में आशियाने की ।
मैं भी था सड़क पर,
तलाश में एक ठिकाने की ।
फिर संयोगवश हम मिले,
वक्त के करम से ।
ये बात चरितार्थ हुई कि
संयोग बनते हैं स्वर्ग में ।
न नकली गहनों का श्रंगार
न लिफाफे, न उपहार ।
न बैंड बाजा, न डी जे
न गुलदस्ते, न बुके ।
बस, बड़ों के आशीष से
हम बंधे अटूट बंधन में ।?
जद्दोजहद की सब यादें
हमने छोड़ दी बहुत पीछे ।
अब गुजर रही सुकून में
छोटी सी छत के नीचे ।।
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2 वर्ष पहले

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