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पत्थर की सदा

                
                                                         
                            ठुकराए हुए पत्थर ने
                                                                 
                            
राहगीर से पूछा ।
ठोकर मारने वाले
मेरी खता तो बता ।।

मैं गतिमय नहीं, पर
उर्जा से भरपूर हूँ ।
यह भाग्य की विडंबना है
कि हिलने तक मजबूर हूँ ।।

मैं तो संभल नहीं सकता
तुम तो संभल सकते थे ।
मुझे मेरे हाल पर छोड़कर
आगे निकल सकते थे ।।

ठोकर मारने की बजाय
हाथ इस्तेमाल कर लेते ।
मुझे राह से उठाकर
कहीं बगल में रख देते ।।
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2 वर्ष पहले

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