ठुकराए हुए पत्थर ने
राहगीर से पूछा ।
ठोकर मारने वाले
मेरी खता तो बता ।।
मैं गतिमय नहीं, पर
उर्जा से भरपूर हूँ ।
यह भाग्य की विडंबना है
कि हिलने तक मजबूर हूँ ।।
मैं तो संभल नहीं सकता
तुम तो संभल सकते थे ।
मुझे मेरे हाल पर छोड़कर
आगे निकल सकते थे ।।
ठोकर मारने की बजाय
हाथ इस्तेमाल कर लेते ।
मुझे राह से उठाकर
कहीं बगल में रख देते ।।
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