बहुत बड़ा है
मेरा संगमरमर का शहर
यहाँ कदम-कदम पर
लोगों के मेले हैं ।
फिर सहमे सहमे से हैं
क्यूँ सब लोग यहाँ
भीड़ में भी क्यूँ
सब लगते अकेले हैं ।।
आम से जरा हटके है
मेरे शहर की फ़ितरत
यहाँ इंसानो के अपने साए भी
फ़ासला बनाकर चलते हैं ।
कुछ लोगों के लिए अलफ़ाज़
महज़ लबों का हिलना भर है
वे बातों ही बातों में
बात बदलते हैं ।।
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