मत लौटाओ उसे प्यासा
सूखे कंठ थके पांव वह
आया लेकर मन में आशा
दो घूंट जल की अभिलाषा ।।
मत लौटाओ उसे प्यासा ।।
पनघट पर, जल घट भर,
तुम खींच कूप से लाते ।
क्या कलश प्रश्न करता तुमसे,
किसको तुम ये नीर पिलाते ?
पूछकर कुल प्यासे पथिक का,
अपमान करो न मनुष्यता का ।।
वंचित उपेक्षित को भी अब,
लगने दो जग अपना सा ।
मत लौटाओ उसे प्यासा ।।
स्वामी नहीं तुम धरा गगन के,
न ऋतु-चक्र है अधीन तुम्हारे ।
न वश में तुम्हारे सागर लहरें,
न परिक्रमा में चाँद सितारे ।
रक्त एक सिराओं में सबकी
सांसो में प्रवाह एक हवा का,
तुम सृष्टा नहीं, फिर कैसे इस ,
जल पे है अधिकार तुम्हारा ।
मत लौटाओ उसे प्यासा ।।
-सत्यपाल सिंह
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