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कत्ल विश्वास का

                
                                                         
                            एक कत्ल !
                                                                 
                            
प्रेम का,
विश्वास का,
मानवता का,
जिससे खिन्न है पूरा देश,
देता है संदेश ।
उन सब बेटियों को,
जो अपनी सोच को ।
नासमझी के खेल में,
कर देती हैं कैद उस जेल में ।
जहां से रिहाई का कोई मौका नहीं मिलता,
बंद चारदीवारी में कोई झरोखा नहीं मिलता ।
जहां सपनो की कली,
कभी महकती नहीं बनकर फूल ।
मौत बन जाती है आखिर,
अपनी हठ, अपनी भूल ।।
बिना सोचे समझे,
निकल जाती हैं घर से
अनसुनी करके उनकी बातों को,
जिन्होने जगाया था अपनी रातों को ।
उसे लयमय लोरी सुनाते हुए,
ममता की थपकी से थपथपाते हुए,
उसकी मीठी नींद के लिए,
अच्छी नींद के लिए,

कभी सीता और सावित्री के किस्से ।
बने होंगे उसकी परवरिश के हिस्से ।।
दुनियादारी क्या है,
पिता ने समझाया होगा ।
यह फरेबी बहुरूपी दुनिया है,
बताया होगा ।।
दिया होगा अपनी संस्कृति का ज्ञान ।
बताया होगा, क्या है उसकी पहचान ।।

लाडली के लिए मां ने,
देखे होंगे सपने ।
उसे लाल जोडा पहनाने के ।
अपने हाथों से सजाने के ।।
काश ! जो हुआ , न होता,
जरुरत नहीं उसे दोहराने की ।
जरुरत है तो बस,
समझने की, समझाने की ।।
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3 वर्ष पहले

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