काल के अधीन हम ।
काल से थमें कदम,
काल से बढें कदम ।।
काल के अधीन हम ।।
हरे-भरे हो सूखे जंगल,
पंख-पखेरू का हो मंगल ।
शाखाओं पर केलि करें कोंपल,
हरित डाल पर कुहुकें कोयल ।
मरूधर में महके चमन
गूंजे भंवरों की गुंजन ।
काल जब तक मेहरबां,
टूटे न श्वास-श्रंखला ।
हर उलझन सुलझ जाए,
काल का जब हो करम ।।
काल के अधीन हम ।।
काल से दरिया में कलकल,
काल से सागर में हलचल ।
काल की जो भृकुटि तने,
कांपे धरा, सागर उफने ।
ओला-वृष्टि हो, गिरी गिरे,
संकट से सृष्टि घिरे ।
मनुज मनुज का संहार करे,
मनुजता को शर्मसार करे ।
काल जख्म भी दे
काल ही बने मरहम ।।
काल के अधीन हम ।।
-सत्यपाल सिंह
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