जिंदगी चली जा रही है ।
घड़ी घडी उम्र
निकली जा रही है ।।
बढ रहे हैं कदम
आखिरी मंजिल की ओर
पग-पग दूरी
घटी जा रही है ।।
सागर से उठी
उड़ी हवा के संग ।
बदरी को नही मालूम
वह कहाँ जा रही है ।।
तूफां में घिरी बुलबुल
मुश्किल में है बडी ।
गिरती संभलती
उड़ी जा रही है ।।
अभी-अभी सहर थी
दोपहर हो गई ।
बस इक पल में धूप
ढली जा रही है ।।
उदास चेहरों पर हंसी
ला सको तो लाओ ।
बांट लो जो तुम्हारे हिस्से
खुशी आ रही है ।।
-सत्यपाल सिंह
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