आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जिन्दगी चली जा रही है

                
                                                         
                            जिंदगी चली जा रही है ।
                                                                 
                            
घड़ी घडी उम्र
निकली जा रही है ।।

बढ रहे हैं कदम
आखिरी मंजिल की ओर
पग-पग दूरी
घटी जा रही है ।।

सागर से उठी
उड़ी हवा के संग ।
बदरी को नही मालूम
वह कहाँ जा रही है ।।

तूफां में घिरी बुलबुल
मुश्किल में है बडी ।
गिरती संभलती
उड़ी जा रही है ।।

अभी-अभी सहर थी
दोपहर हो गई ।
बस इक पल में धूप
ढली जा रही है ।।

उदास चेहरों पर हंसी
ला सको तो लाओ ।
बांट लो जो तुम्हारे हिस्से
खुशी आ रही है ।।
-सत्यपाल सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर