ज़िन्दगी बेहतर हो सकती थी ।
मजबूरी तो नहीं थी
धुंधली राह पर चलना ।
सफ़र की कोई निर्मल
डगर हो सकती थी ।।
वक्त की पुकार को
अगर सुन लिया होता ।
गुमराह ज़िन्दगी खुद
अपनी रहबर हो सकती थी ।।
लम्हे कईं दस्तक देकर
लौटे गए होंगें दर से ।
बेपरवाह नजर जो उधर थी
वो इधर हो सकती थी ।।
ज़िन्दगी बेहतर हो सकती थी ।।
-सत्यपाल सिंह
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