तुमने जो वफा का सिला दिया
मुमकिन नहीं अब हम मिलें
यह भी तो नामुमकिन है कि
निकाल सकूं मैं दिल से तुझे
मेरी मौत की जब खबर मिले
शरीक को जाना मेरे जनाजे में
शायद रूबरू हो जाओ तुम
मेरी तडपती थी रूह से
और हो जाए तुम्हें यकीं
कि किस कदर
मुझे, तुझसे मुहब्बत थी ।।
-सत्यपाल सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X