अब तू मुसकुराए या अश्क बहाए,
ये तुझ पर छोडता हूँ, ऐ जिन्दगी !
मैंने यादों में रखली संजोकर
उसकी वफा भी और बेवफ़ाई भी
उनकी नजरों से नजरें क्या मिली
सौ इल्जाम मेरी नज़रों पर लगे ।
उनकी नजरों को भी पढ लेती
काश ! ना-इंसाफ़ जमाने की नजरें ।
-सत्यपाल सिंह
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