ढलती उम्र के निशां
आइना भी इशारा करता है,
हम भी समझने लगे हैं ।
ढलती उम्र के निशां,
चेहरे पर उभरने लगे हैं ॥
क्या जवाँ उम्र थी,
क्या सरस जिंदगी थी ।
खुले आसमाँ मे भरते थे
इशक़ की परवाज ऊंची ।
हौंसलों के परिंदे आस्मां से
अब धरती पर उतरने लगे हैं ॥
ढलती उम्र के निशां
चेहरे पर उभरने लगे हैं ॥
फूल पत्तियों से लदा, हरा भरा,
गंभीर सा, कभी मस्खरा सा ।
किसी थके पथिक की छाया सा ।
फलित, फलदार, खट्टा मीठा सा,
ये जीवन वृक्ष
अब मुरझाने लगा है
फूल, पत्तियाँ, फल
सब झरने लगे हैं ॥
ढलती उम्र के निशां
चेहरे पर उभरने लगे हैं ॥
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