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दर्द बहुत है

                
                                                         
                            दर्द बहुत है दबाकर रखा है ।
                                                                 
                            
निगाहों के पीछे छुपाकर रखा है ।।

बात जुबां पर आई,
तो दर्द छलक जाएगा
अश्कों का सैलाब फिर,
रोके न रूक पाएगा
पढ ना लें दर्द कहीं
लोगों की निगाहें
निगाहों को यह
समझाकर रखा है ।।

दर्द बयां करूं तो किसे
कौन सुनेगा दर्द मेरा ?
इस तंग-फुर्सत जहाँ में
कौन बनेगा हमदर्द मेरा ?
शायद कोई दर्द पुराना
नए दर्द की दवा बने
हर दर्द को इसलिए
सजाकर रखा है ।।
-सत्यपाल सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 महीने पहले

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