सुलह होते-होते, कलह हो गई ।
जिद जंग की, वजह हो गई ।।
हठ की परिणति
विलापता विनाश है
गुरूर का भी
हो रहा उपहास है
शस्त्र असंख्य चल गए
हालात अब बदल गए
उलझी बात सुलझे अब
लगी आग बुझे अब
लेकिन
रूके कौन ? झुके कौन ?
इस सवाल का जवाब मौन !
कौन करे पहल यही उलझन है
जिन्दगियों से बड़ा
झूठी प्रतिष्ठा का प्रश्न है ।।
आसमान गरज रहा
बारूद बरस रहा
आशियां टूट रहे
बस्तियां जल रही
हंसती जिन्दगियां
मौत में बदल रही
सभ्यता उजड़ रही
संस्कृति सुबक रही
हद से गुजरता
ये कैसा पागलपन है ।।
झूठी प्रतिष्ठा का प्रश्न है ।।
-सत्यपाल सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X