अनचाहा अतिथि सा
अकेला हूँ मैं
शहर में अपनो के ।।
कल था फलित, आज
पतझर के तरूवर सा ।
मैं शून्य हूँ शून्य में
अनसुना स्वर सा ।
तट से टकराती
मिटती लहर सा ।
डूबता थकित सूर
शाम की पहर का ।
घेरे मुझे शूल बन
पद्म सपनो के ।।
अकेला हूँ मैं
शहर में अपनो के ।।
आदिम काल से मानव
काल के साथ चला ।
कभी अकेला कभी
आदमी के साथ चला ।
स्वार्थ परायण सब
न कोई निस्वार्थ चला ।
कब कौन कहाँ यहाँ
एक पग परमार्थ चला ?
काल संग बदल गए
स्वभाव स्वजनो के ।।
अकेला हूँ मैं
शहर में अपनो के ।।
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