नारी कंठ से स्वर ये गूंजा,
अबला नहीं , मैं हूँ सबला ।
मैं आरूढ़ उस विजयी रथ पर,
कामयाबी के पथ पर जो चला ॥
मैं थी , कहाँ नहीं ?
मैं हूँ , कहाँ नहीं ?
है सब अपूर्ण मेरे बिना,
सम्पूर्ण ये जहाँ नहीं ॥
मैंने देश की शान में,
राष्ट्र के सम्मान में ।
बनाए कीर्तिमान कई,
खेल के मैदान में ॥
मैं योग में, ध्यान में,
मैं ज्ञान में, विज्ञान में ।
आसमां को जीत मैंने,
अंतरिक्ष की उडान में ॥
राष्ट्र रक्षा में हिस्सेदार,
मैं सीमा पर हूँ पहरेदार ।
जल,थल, नभ में तत्पर,
करने को शत्रु का संंहार ॥
मैं ममता की कहानी भी,
रण में झांसी की रानी भी ।
मैं शांत भी, गंभीर भी,
प्रचंड लहरोंं की रवानी भी ॥
पर्वत शिखर पर परचम,
लहराने का मैं रखती दम ।
महासागर का महाविस्तार भी,
मेरे साहस के आगे है कम ॥
सत्यपाल सिंह
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