अब फिर से मुस्कुराने लगा हूँ में
माज़ी के गम सब भुलाने लगा हूँ मैं ।
गुमसुम सा रहता था अपने आप में
अब खुद से बतियाने लगा हूँ मैं ।
जो भूल गए थे मुझे, मेरी बातों को
अपने बेगाने सबको याद आने लगा हूँ मैं ।
मेरे अपने गीत, जो बिसरा दिए थे मैंने
उन गीतों को अब गुनगुनाने लगा हूँ मैं ।
बहुत देर चला मैं खुद से दूरी बनाकर
फ़ासले मिटाकर खुद के करीब आने लगा हूँ मैं ।
जो टूट कर बिखर गए थे उन
ख़्वाबों को फिर सजाने लगा हूँ मैं ।
मुझे न ख़बर थी शामो-ओ-सहर की कोई
उगते सूरज को शीश झुकाने लगा हूँ मैं ।
फीके पड़ गए थे जिंदगी के रंग सब
रंगो-उमंगो की महफिल सजाने लगा हूँ मैं ।
-सत्यपाल सिंह
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