संग- दिल न तुम थी
बेपरवाह न हम थे
घड़ी दो घड़ी नहीं
कदम दो कदम नहीं
दूर तक बरसों
हम तुम साथ चले
फिर मिलते क्यूँ हैं
अब एक दूसरे से
हम बनकर अजनबी से
भुलाकर शिकवे गिले
आओ हम फिर मिलें
प्रेम से रौशन कर लें
अपनी हर राह को
मिलकर जिंदा कर लें
अपनी हर चाह को
वक्त से करके ये वादा
जुदा न होंगे हम एक पल
माँग लें खोया हुआ
अपना वो सुनहरा कल।
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