आख़िरी सफर पर,
निकलना बाकी है ।।
बहुत हो चुकी,
भाग दौड़, उछल कूद,
बस थोड़ा और,
कूदना उछलना बाकी है ।।
कईं राहें चली, कईं मंजिले पाई,
आख़िरी मंजिल की,
आख़िरी राह पर,
चलना बाकी है ।।
सूरज बढ़ रहा है,
अनवरत क्षितिज की ओर,
धूप नर्म पड़ चुकी
दिन ढलना बाकी है ।।
जीर्ण-शीर्ण हुआ आशियाना,
अब ना-क़ाबिल-ए-मरम्मत है,
पंछी का पिंजरे से,
निकलना बाकी है ।
आख़िरी सफर पर
निकलना बाकी है ।।
-सत्यपाल सिंह
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