इन आंखों ने सब कुछ देखा।
कभी सूरज की किरणों के उजाले देखा, तो कभी उन किरणों को डूबते देखा।
कभी बच्चो को स्कूल जाते देखा, तो कभी एक बचपन को भीख मांगते देखा।
इन आंखों ने सब कुछ देखा।
कभी लोगों को जहाज में उड़ते देखा ,तो कभी तपती धूप में नंगे पांव चलते देखा।
कभी बच्चों को खिलौनों से ऊबते देखा तो कभी एक निवाले के लिए बच्चे को तरसते देखा।
कभी खेतों में लहराती हरियाली देखा, तो कभी सड़क पर भूख से गरीब को तड़पते देखा ।
कभी मोटापे का इलाज कराते देखा,तो कभी बिना इलाज इंसान मरते देखा।
इन आंखों ने सब कुछ देखा। कभी बदलता समाज देखा तो कभी घरों में बैठा पिछड़ापन देखा।
इन आंखों ने सब कुछ देखा।
कभी विकास के वादों को करते देखा,तो कभी बिगड़ती- पिछड़ती अर्थव्यवस्था को देखा।
इन आंखों ने तो सब कुछ देखा लेकिन बेबस आंसुओं को सब कुछ कहते किसी ने नहीं देखा।।
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