बारिश की बूंदें
शीतल पुरवैया
तलते पकौड़े की खुश्बू
फिर भी
कैसे कह दूँ --
बरसात मुबारक!
उफनती नदियाँ
दरकती जमीन
खिसकते पहाड़
गिरती बिजलियाँ
कचरे के ढेर
फैलती बीमारियां
फिर
कैसे कह दूँ --
बरसात मुबारक!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X