लड़खड़ाए वादियों में गिर संभल रहा ये दिल
ख्वाब तितलियों का ये जो ले के चल रहा ये दिल
कूंकती ए वादियां, ए घाटियां नदी पहाड़
तेरे हुस्न-ओ-शबाब पर फिसल रहा ये दिल
सुन खिली कली तुझे जवान होते देख कर
रूप दिन-ब-दिन तेरी तरह बदल रहा ये दिल
झील सी निगाह तेरी एक बार क्या मिली
हर तेरी अदा पे आज तक मचल रहा ये दिल
खुशबुओं सी वस्ल जो कभी तेरी नसीब थी
आज दूसरों के संग है तो जल रहा ये दिल
खुद-ब-खुद नहीं हुआ शब-ए-फिराक रूह से
पी ली शब-ए-वस्ल में तो हाथ मल रहा ये दिल
सर्दियों में धूप सेकती दिखी जिधर कली
झांकता उसी गली में फिर से छल रहा ये दिल
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