रात-रात भर जागकर, जिसने किताबें छानी हैं,
उस सीधे-साधे छात्र की, यह दर्दभरी कहानी है।
आँखों में लेकर सपने वो, दिन-रात एक करता है,
माता-पिता की उम्मीदों का, वो बोझ अकेले ढोता है।
पर चंद रूपयों की खातिर, ईमान यहाँ बिक जाता हैं,
मेहनत की गाढ़ी स्याही पर, पर्चा लीक हो जाता है।
अंधा कानून सो रहा, सरकारें आँखें मूंद रहीं,
मासूमों के अरमानों को, भ्रष्टाचारी चीर राहीं।
मेहनत की रोटी छीन रहे, ये कुर्सी के जो भूखे हैं,
छात्रों के बहते आंसुओं से, इनके दिल भी सूखे हैं।
पर मत सोचना तोड़ दोगे, तुम हौसले इस युवा के,
इंसाफ माँग कर रहेंगे हम, इस तंत्र के हर कुएं से।
कलम की ताकत जागेगी, जब क्रांति का बिगुल बजेगा,
हर बेईमान इस देश का, फिर थर-थर काँप उठेगा।
कब तक ये लाचारी होगी? कब तक ये अन्याय सहे?
सपनों के महल ढह रहे, आँखों से बस आंसू बहें।
पर मत होना तुम निराश, ये वक्त भी बदल जाएगा,
मेहनत का सूरज चमकेगा, और अंधकार मिट जाएगा।
उठो युवाओं, सुर मिलाओ, अपनी आवाज को बुलंद करो,
इस सोई हुई व्यवस्था को, अब सच का आईना बंद करो।
-: सार्थक पियुष सिंह
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