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मजबूर पिता का समर्पण

                
                                                         
                            पीठ पर बोझा उठाए चलता है वो निरंतर,
                                                                 
                            
दर्द छुपाकर सीने में, जीता है वो हर पल।
हाथों के छालों में परिवार का भविष्य है,
उसके पसीने की हर बूंद का गहरा रहस्य है।

थक कर भी जो कभी आराम नहीं करता,
बच्चों की भूख देख, जो अपनी भूख नहीं गिनता।
फटे हुए जूतों में वो मीलों का सफर तय करता है,
अपनी खुशियों को वो हंसकर खुद ही दफन करता है।

मजबूरी की धूप में वो छांव बनकर खड़ा रहता है,
दुनिया के हर ताने को वो खामोशी से सहता है।
जिसने कभी न सोचा था कि ये काम करना होगा,
हालात के आगे उसे भी हर रोज झुकना होगा।

वो बाप है जो अपने बच्चों को हंसता देखना चाहता है,
उनके चेहरों पर खुशी लाने को दिन-रात कमाता है।
जिम्मेदारी के बोझ तले उसका कंधा झुक जाता है,
पर अपनी संतानों के आगे वो कभी न हार मानता है।

सलाम है उस मजबूर पिता के अटूट इस हौसले को,
जो खुद को जलाकर रौशन करता है अपने घोंसले को।
मजबूरी में लोग क्या-क्या नहीं कर जाते हैं,
अपनों की खातिर वो हर मुश्किल से लड़ जाते हैं।

-: सार्थक पियुष सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

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