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साँसों का अकाल

                
                                                         
                            पेड़ कटे तो धूप बढ़ी, बढ़ता गया ताप,
                                                                 
                            
नदियाँ सूखी, खेत सूखे, सूख गया संताप।
धरती माँ के घावों पर, मरहम कोई न धरता,
कैसा मानव बन बैठा है, अपना घर ही भरता।
जिस छाँव में पीढ़ियाँ पलतीं, वह छाँव कहाँ है,
शहर खड़ा है सामने, पर जीवन कहाँ है?।।

कल तक जिस आँगन में तुलसी मुस्काती थी,
भोर पवन के संग चिड़िया गीत सुनाती थी।
नीम तले बैठा था बूढ़ा, सुनता पोते की बात,
अब ए.सी. के कमरों में कैद हुई बरसात।
मिट्टी से रिश्ता टूटा, टूटा गाँव-जहान,
ईंटों के जंगल में खो बैठा इंसान।।

नन्हा पौधा पूछ रहा—“मेरा अपराध क्या?”
क्यों मुझसे पहले काट दिया, मेरा अधिकार क्या?
कुल्हाड़ी के वारों से जंगल रोता रहा,
लाभ कमाने वाला मानव सोता रहा।
आज वही वृक्षों की छाया खोज रहा है,
अपने ही कर्मों का फल भोग रहा है।।

पक्षी के घर उजाड़कर महल बना लिए,
नदियों के पथ रोककर बाँध बना लिए।
पर्वत का सीना चीरा, धरती को छलनी किया,
फिर मौसम ने जब रूठा, प्रकृति को दोष दिया।
कुदरत मौन रही तो उसको कमजोर समझ लिया,
अब उसने करवट ली तो संसार काँप गया।।

कहीं बाढ़ का पानी, कहीं सूखे की मार,
कहीं तपती दोपहरी, कहीं तूफानों का वार।
ऋतुओं का संतुलन अब डगमगाने लगा,
मौसम भी अपना स्वभाव बदलने लगा।
हमने प्रकृति की सीमा जब-जब लाँघी है,
हर बार धरती ने चेतावनी माँगी है।।

बच्चों को क्या देंगे—धुआँ, धूल या आसमान?
सूखी नदियाँ, तपते पत्थर या हरा-भरा जहान?
हमने तो जीवन पाया था वृक्षों की छाँव में,
क्या उनकी पीढ़ी जिएगी केवल कंक्रीट के गाँव में?
आज अगर जंगलों की रक्षा नहीं करेंगे,
कल अपने बच्चों की आँखों में क्या देखेंगे?।।

चलो फिर एक संकल्प करें, धरती का मान बढ़ाएँ,
कटते जंगल रोकें, लाखों पौधे लगाएँ।
नदी, ताल, सरोवर को फिर जीवन से भर दें,
सूखी धरती के माथे पर हरियाली धर दें।
विकास वही जो जीवन को साथ लेकर चले,
ऐसा दीप जलाएँ जिससे सात पीढ़ियाँ फलें।।

शहर बनाना है तो पहले जीवन बचाइए,
ईंटों के संग वृक्षों की कतार लगाइए।
ऊँची इमारत से ऊँचा विचार चाहिए,
धरती को बचाने का संस्कार चाहिए।
साँसों का अकाल यूँ ही नहीं मिट पाएगा,
हर मनुष्य जब वृक्ष बनेगा, तभी जीवन मुस्काएगा।।

पेड़ काटकर जो शहर बसाया है तुमने,
अब उसी शहर में हरियाली उगानी होगी।
साँसों का जो अकाल खड़ा किया है हमने,
उसकी कीमत आने वाली पीढ़ी को नहीं चुकानी होगी।।

पत्थर के मकाँ बहुत बना लिए हमने,
अब मिट्टी से रिश्ता जोड़ना होगा।
धरती केवल रहने की जगह नहीं—
इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ना होगा।।

“पेड़ बचेंगे—तो प्राण बचेंगे,
प्राण बचेंगे—तो इंसान बचेंगे।”

 
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50 मिनट पहले

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