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काश

                
                                                         
                            काश के कोई ऐसा दिन हो जाए ।
                                                                 
                            
ज़माने के सारे सितम खो जाए ।

ज़ुल्मी जब-जब ज़ुल्म करना चाहे ।
उसके मन में कानून का डर हो जाए ।

मजदूर अपनी मजदूरी पाकर संतुष्ट हो जाए ।
और उसके बच्चे पेट भर खाना खा कर खुश हो जाए।

इंसान इंसान की इज्ज़त करे और
सभी धर्मो में मुहब्बत हो जाए ।

हर लड़की यहां सुरक्षित महसूस करे ।
बस ज़माना इतना शिक्षित हो जाए ।

यहां हर व्यक्ति इतना सक्षम हो जाए कि,
यह देश ' महान से महानतम ' हो जाए ।

काश के कोई ऐसा दिन हो जाए ।
ज़माने के सारे सितम खो जाएं ।

मैं मानता हूं , ज़माना अब भी उतना बुरा नहीं ,
मगर ऐसा हो तो , किया बात हो जाए ।

और यह मुमकिन है , अगर तुम मान लो ।
इन अल्फ़ाज़ों को ठान लो ।

काश की कोई ऐसा दिन हो जाए ।
ज़माने के सारे सितम खो जाएं ।

साकिब उल इस्लाम
छात्र , झारखंड


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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