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अकेले चलो, काफिला मत ढूंढो

                
                                                         
                            एक दो नहीं साहब यहां लाखों यार होंगे
                                                                 
                            
अगर दिन हुए अच्छे तो रिश्ते हजार होंगे

तुम जरा ढलते वक्त में परखना इन्हें
जरूरत पर नकली चेहरे तार तार होंगे

भ्रम मत पालना की यहाँ सब तुम्हारे है
बड़ी मुश्किल से अर्थी में कांधे चार होंगे

अकेले चलो काफिला मत ढूंढो
क्योंकि भीड़ में दुश्मन बेशमार होंगे

ज़माने की रीत यही है,
मतलब की दुनिया है
जो आज झुक रहे हैं
कल सिर पर सवार होंगे

सच्चे वही हैं जो खामोशी से, थामें हाथ तुम्हारा
बाकी सब शोर मचाते,
राहों के गुबार होंगे

- संतोष कुमार सिंह 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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