इतनी ठोकरें मिली मुझे ज़माने से,
कि जूते भी अब नागुजार लगे |
थक गयी है नींदे मेरी,
कि रातें भी अब नागुजार लगे |
सोचा जाकर बैठ जाऊँ वीरान में कहीं,
बेवफ़ा बादल भी अब वहीं बरसने लगे |
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X