क्रोध एक अदृश्य ज्वाला है,
जिसने इसको पाया है,
अपने सद्गुणों को जलाया है।
करती संहार पहले उसका,
जिसने इसे बुलाया है।
बड़ी भयानक ये ज्वाला है,
जिसने इसको अपनाया है,
जीवन में बड़ा दुख पाया है।
सद्बुद्धि भी जाती है,
ज्ञान के दीपक बुझाती है,
अपनी ज्वाला फैलाती है,
अंधकार को बढ़ाती है,
लक्ष्य से भटकाती है,
अपनों के विरुद्ध ले जाती है।
मन में फैली है ज्वाला,
क्यों बुझने में नहीं आती है?
मानव को चिंतित, विचलित बनाती है।
यह संभव हो सकता है,
यदि मन में ज्ञान की धारा हो,
तभी मिटेगा मन का अंधेरा,
फिर होगा जीवन में नया सवेरा,
जिससे होगा सुखमय जीवन तेरा।
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