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मिट्टी का कर्ज

                
                                                         
                            धारा के साथ साथ मैं चल नही सकता,
                                                                 
                            
तुम्हारी सोच के साँचे मे ढल नही सकता l

ये तरक्की के पैमाने मुझको रास आते है कहाँ?
गिराकर दूसरो को आगे निकल नही सकता l

अपनी मंजिल का ईलम बखूबी है मुझको,
शोहरत- ऐ- जमाना देखकर राह बदल नही सकता l

जुल्मतो के दौर मे भी ख्वाब रौशनी के देखना,
कोई सितम ख्वाबो को मसल नही सकता l

वतन की मिट्टी के मुझ पर एहसान है बहुत,
चाहूँ तो भी कर्ज इसका उतर नही सकता l
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10 घंटे पहले

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