धारा के साथ साथ मैं चल नही सकता,
तुम्हारी सोच के साँचे मे ढल नही सकता l
ये तरक्की के पैमाने मुझको रास आते है कहाँ?
गिराकर दूसरो को आगे निकल नही सकता l
अपनी मंजिल का ईलम बखूबी है मुझको,
शोहरत- ऐ- जमाना देखकर राह बदल नही सकता l
जुल्मतो के दौर मे भी ख्वाब रौशनी के देखना,
कोई सितम ख्वाबो को मसल नही सकता l
वतन की मिट्टी के मुझ पर एहसान है बहुत,
चाहूँ तो भी कर्ज इसका उतर नही सकता l
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